शुक्रवार, 17 अप्रैल 2020

कोविड -19 की रिपोर्टिंग में वैज्ञानिक दृष्टिकोण, विश्वसनीयता और तथ्यपरकता की जरूरत है, न कि सनसनी फैलाने वाली भ्रामक सूचनाओं की - प्रोफेसर बंदना पांडेय


गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय, ग्रेटर नोएडा के जन संचार एवं मीडिया अध्ययन विभाग ने '  कोविड -19 विमर्श: महामारी का सामना ' विषय पर विभाग के पहले वेबिनार का आयोजन किया

                                                                                                                          16/04/2020


कोरोना वायरस की विश्वव्यापी महामारी से निपटने के लिए और लोगों को संक्रमण से बचाने के लिए राष्ट्रीय लॉक डाउन का दूसरा चरण तीन मई तक के लिए घोषित किया गया है। संकट की इस घड़ी में गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय, ग्रेटर नोएडा में ऑनलाइन माध्यमों से शिक्षण कार्य जारी है और अत्याधुनिक संचार तकनीकों की सहायता से अनुसंधान और शैक्षणिक गुणवत्ता बढ़ाने में सहायक वेबिनार का आयोजन भी किया गया। जीबीयू के जन संचार और मीडिया अध्ययन विभाग की चेयरपर्सन और विभागाध्यक्ष प्रोफेसर बंदना पांडेय की पहल पर विभाग ने आज '  कोविड -19 विमर्श : महामारी का सामना ' विषय पर  वेबिनार का आयोजन किया।

वेबिनार के प्रथम सत्र में परिचय वक्तव्य प्रस्तुत करते हुए जीबीयू के जन संचार और मीडिया अध्ययन विभाग की चेयरपर्सन और विभागाध्यक्ष प्रोफेसर बंदना पांडेय ने कहा कि  विश्वव्यापी संक्रामक बीमारी के बारे में रिपोर्टिंग के दौरान वैज्ञानिक दृष्टिकोण से तैयार किए गए तथ्यपरक समाचार प्रसारित किए जाने चाहिए, न कि सनसनीखेज और भ्रांति पैदा करने वाले सूचनाएं देना चाहिए। प्रोफेसर पांडेय ने कहा कि कोविड 19 इतना गंभीर संकट है कि इसके बारे में हर तरह की सूचनाएं जानने के लिए लोग उत्सुक हैं। पत्रकारों के लिए यह समय श्रेष्ठ पत्रकारीय मुल्यों और गुणवत्तापूर्ण रिपोर्टिंग करने का एक अवसर है। कोरोनावायरस संक्रमण की रिपोर्टिंग में पत्रकारीय जिम्मेदारी का ध्यान रखा जाना चाहिए और अस्पष्ट, भ्रामक और लोगों में पैनिक पैदा करने वाली सूचनाएं नहीं दी जानी चाहिए। तथ्यपरक, वैज्ञानिक दृष्टिकोण से युक्त और प्रभावी समाचार तभी दिए जा सकते हैं, जब महामारी के विभिन्न पक्षों को समग्रता में जानकर, इसके सभी आयामों के साथ विश्वसनीय स्रोतों द्वारा दिए गए इनपुट्स के आधार पर स्टोरी लिखी जाए। एक पत्रकार को इस अभूतपूर्व दौर में स्रोतों की विश्वसनीयता, व्यापक संदर्भ सामग्री, विवेक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण का प्रयोग करके ही रिपोर्टिंग करनी चाहिए।

प्रथम सत्र की दूसरी वक्ता  सेवानिवृत्त आईआईएस अधिकारी और वरिष्ठ मीडिया कंसलटेंट एवं लेखिका डॉक्टर शालिनी नारायणन ने कोविड 19 के संकट और सोशल मीडिया के संदर्भ में  चुनौतियों और सरकार के प्रयासों की चर्चा की। उन्होंने कहा कि व्यवहार परिवर्तन संचार के दृष्टिकोण से देखें तो कोविड 19 सरकार के लिए बहुत बड़ी चुनौती है। वर्तमान सरकार में शीर्ष नेतृत्व स्तर से ही जनता से सीधे संवाद किया जा रहा है। प्रधानमंत्री जी ने जब जनता कर्फ्यू के लिए लोगों से कहा तब लोगों ने उसका पूरी तरह पालन किया और इस प्रकार से लॉक डाउन को क्रियान्वित कर पाने का निर्णय लेने की पृष्ठभूमि बनी। लॉक डाउन का पालन करने के लिए लोगों को प्रेरित करने में प्रधानमंत्री की भारत के लोगों में अत्यधिक लोकप्रियता ने बहुत मदद की है। इसी तरह, समाज के स्तर पर भी कई चुनौतियां आई हैं। अत्याधुनिक संचार तकनीकी वरिष्ठ नागरिकों के लिए इतनी आसान नहीं होती है जितना युवाओं के लिए, लेकिन कोरोना संकट के कारण अत्याधुनिक संचार तकनीकी के प्रसार में लगने वाला समय घट गया है और बहुत तेजी से इंटरनेट आधारित संवाद माध्यमों को लोगों ने अपनाया है। इन नए माध्यमों को अपनाने के लिए इस संकट के दौरान  लोग बाध्य से हो गए हैं। अफवाहों को रोकने के लिए भी सरकार ने प्रेस सूचना ब्यूरो के अंतर्गत फैक्ट चेकिंग यूनिट बनाई है।इस यूनिट में प्रतिदिन 1000 से अधिक सूचनाएं लोग जांच करने के लिए भेज रहे हैं। यह दर्शाता है कि इस अभूतपूर्व स्वास्थ्य संकट के दौर में झूठी जानकारियों, फेक खबरों और भ्रांतियों के प्रसार की चुनौती बहुत गंभीर है।

दूसरे सत्र  के पहले वक्ता श्री अजय कुमार, मैनेजिंग एडिटर, न्यूज़ नेशन नेटवर्क ने कोरोना वायरस महामारी के इस कठिन समय में न्यूज़ मीडिया की स्थिति के बारे में चर्चा की। उन्होंने कहा कि यह समय हमारे सामने अनेकों चुनौतियों और उन चुनौतियों का सामना करने में उठाए जाने वाले कदमों की कठिनाई का समय है। यह संक्रामक बीमारी ऐसी है की सोशल डिस्टेंसिंग और साफ सफाई रखने के अतिरिक्त हम कुछ कर नहीं सकते। वैक्सीन बनी नहीं है। यह महामारी इतनी जल्दी जाने वाली भी नहीं है न केवल स्वास्थ्य क्षेत्र बल्कि अर्थव्यवस्था के सभी क्षेत्रों पर इस समस्या का गंभीर प्रभाव पड़ेगा। बहुत से उद्योग अत्यंत कठिन परिस्थिति का सामना करेंगे। यह 2008 की वैश्विक मंदी से भी अधिक गंभीर समस्या अर्थव्यवस्था के लिए है। होना चाहिए कि हम संकट की घड़ी में एक दूसरे के साथ खड़े हों। पूरा देश एक साथ मिलकर कोरोना वायरस महामारी के संकट का सामना करे। इस समय  सोशल मीडिया समाचार जानने के लिए भी सबसे महत्वपूर्ण माध्यम बनकर उभरा है। अफवाहों के फैलने की समस्या के बारे में उन्होंने कहा कि यह कमी हम संदेश प्राप्त करने वालों की है कि हम बिना जांच परख किए ही अपने पास आने वाली सूचनाओं को सही मान लेते हैं उस पर भरोसा करके उसे आगे बढ़ा देते हैं।

द्वितीय सत्र के दूसरे वक्ता श्री प्रदीप सुरीन, असिस्टेंट एडिटर, जी न्यूज डिजिटल ने मिसइंफॉर्मेशन और मीडिया के स्व नियमन की चर्चा करते हुए कहा की वेब जर्नलिज्म में समय की कमी होती है किसी के पास अफवाहों और गलत सूचनाओं को जांच परख कर सत्य तक पहुंचने के लिए श्रम करने का समय नहीं होता। कई सूचनाएं ऐसी होती हैं जो व्हाट्सएप और फेसबुक जैसे माध्यमों पर आती हैं लेकिन उनकी विश्वसनीयता की जांच करना बहुत मुश्किल होता है। जो फेक कंटेंट है, उस पर सामान्यता कोई न कोई फर्जी मुहर लगी होती है या किसी प्राधिकार का नकली हस्ताक्षर होता है। आज कई प्रकार की फैक्ट चेक सेवाएं चल रही है।पत्र सूचना कार्यालय, भारत सरकार और विश्व स्वास्थ्य संगठन इस संदर्भ में महत्वपूर्ण जानकारी दे रहे हैं। हम इनका उपयोग कर सकते हैं। इंटरनेट पर बहुत से ऐसे एप्लीकेशन है जिन पर आने वाली सामग्री की विश्वसनीयता की जांच का कोई प्रभावी तरीका नहीं है। इन एप्लीकेशंस को बहुत बड़ी संख्या में लोगों ने डाउनलोड किया  है। टिक टॉक का उदाहरण इस संदर्भ में महत्वपूर्ण है।


वेबिनर के प्रथम सत्र में 70 प्रतिभागियों और द्वितीय सत्र में 75 प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया। कुल मिलाकर 145 प्रतिभागियों ने वेबीनार में हिस्सा लिया। प्रतिभागियों में  देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों - महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय, मोतिहारी, भीमराव अंबेडकर केंद्रीय विश्वविद्यालय, लखनऊ, महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय, रोहतक, भारतीय फिल्म एवं टेलीविजन संस्थान, पुणे, कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी, गुरु जंभेश्वर विश्वविद्यालय, हिसार, माखन लाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय, भोपाल मणिपाल विश्वविद्यालय, जयपुर आदि के विद्यार्थी संकाय सदस्य और  मीडिया कर्मी शामिल रहे। 

यह जीबीयू के जनसंचार एवं मीडिया अध्ययन विभाग द्वारा आयोजित पहला वेबिनार था। वेबिनार के  मुख्य संरक्षक गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर भगवती प्रकाश शर्मा की निरंतर प्रेरणा और बहुमूल्य मार्गदर्शन और स्कूल आफ ह्यूमैनिटीज एंड सोशल साइंसेज की डीन डॉक्टर  नीति राणा के सहयोग से इस आयोजन में बहुत से अनुभवी संकाय सदस्यों और पत्रकारों ने भागीदारी की। 

 कोविड 19 के  मीडिया से जुड़े आयामों को समझने के लिए के उद्देश्य से  वेबिनार का आयोजन जनसंचार और मीडिया अध्ययन विभाग की विभागाध्यक्ष और चेयरपर्सन प्रो. बंदना पांडेय के निर्देशन में पीएचडी रिसर्च स्कॉलर्स संचिता चक्रवर्ती, श्वेता आर्य, मोनिका गौर, शालिनी,विनीत कुमार, गौरव शर्मा और शिवानंद  के सहयोग से किया गया। वेबीनार में मॉडरेटर का दायित्व विभाग के पीएचडी स्कॉलर विधांशु कुमार ने बखूबी निभाया। विभाग द्वारा जानकारी दी गई है कि वेबीनर में शामिल प्रतिभागियों को ई - प्रमाण पत्र भी उपलब्ध कराए जाने की योजना है।

बुधवार, 19 दिसंबर 2018

अनुकूलता में सुख और प्रतिकूलता में कष्ट प्राणिमात्र का स्वभाव है। प्राणियों में मनुष्य अनुभूति / भावना और विचार की सर्वाधिक ऊंचाई पर माना जाता है। मनुष्य का जीवन जगत में है, हर आदमी किसी न किसी परिस्थिति में जीवन जी रहा और फैसले कर रहा है।यह परिस्थिति - कौन किसका पुत्र/ किस परिवार का है,कितनी संपत्ति का मालिक है,कौन सी भाषा बोलता है , क्या कर सकता है क्या नहीं, किस देश,क्षेत्र का है ,समाज,शिक्षा आदि चीजों से तय होती है। परिस्थिति पर हमारा वश नहीं है। वश केवल अपने पर ,वो भी बहुत सीमित रूप में है। ऐसे में ही कहा गया कि कर्म पर ही अधिकार है।

जो संसारी हैं, सबके मन में  सपने हैं। किसी को कुर्सी चाहिए,किसी को पैसा, किसी को प्रतिष्ठा, और भी बहुत कुछ , असीम अनंत है सपनों की गिनती। यह मानव स्वभाव है,किसी एक का नहीं कि उसे भर अनुशासित कर दिया जाय । ये सपने इच्छाएं हैं- कामनाएं, जरूरतों से उपजी, अनिवार्य और गैर अनिवार्य।

बस यही रहा है मानव इतिहास का अफसाना कि लोगों के सपने अलग अलग होते हैं। किन्हीं दो लोगों ने कभी बिल्कुल एक सा सपना नहीं देखा। यह इसलिए की कोई दो व्यक्ति एक से हैं ही नहीं । छह सात अरब में कोई दो एक से हैं ही नहीं ।जितने आदमी उतने सपने। अगर विचार स्थितियों से बनते हैं,तो जितने आदमी हैं उतनी स्थितियां हैं,उतने ही विचार भी होने ही हैं।

ऐसे में ही सारे धर्म बने । कानून बने । नैतिक मूल्य बने। रीति रिवाज और परंपराएं बनीं। इन सबको गति देने के लिए दफ्तर और इमारतें बनीं।

परिवार केवल जैविक इकाई नहीं,सुरक्षित समूह  में जीने की भावनात्मक - नैतिक - सामाजिक - आर्थिक इकाई भी है। सबसे प्राथमिक समूह है। सबसे मजबूत संस्था है। रामायण और महाभारत की कहानियां परिवारों की कहानियां पहले हैं,राजनीति की बाद में हैं।

जो परिवार से भी अधिक सघन और एकाकार है , वह है व्यक्ति। व्यक्ति एक सम्पूर्ण विश्व है स्वयं में । उसमें वह सब कुछ है जो सारे संसार में कहीं भी है। हर व्यक्ति की भावनाएं हैं , विचार हैं जिनके साथ उस व्यक्ति की क्षमताएं जुड़ी हुई हैं।ये क्षमताएं हैं, लेकिन सीमित हैं। हर शेर के सामने कोई न कोई सवा शेर आना ही है,आज नहीं तो कल। सभी अपनी सीमा से पार जाने में बढ़िया महसूस करते हैं। व्यक्ति बहुत छोटा है,पर संसार भर से लड़ता रहा है। कभी किसी बात के लिए,कभी किसी बात के लिए। हर व्यक्ति के सामने हर क्षण कोई न कोई फैसला है करने को,निर्णय न करना भी उसी का निर्णय माना जाता है। ऐसे में चीज़ें किसी के लिए आसान नहीं ।

मतांतर स्वाभाविक है । बहुत से मतों में कोई एक नहीं, कई सही होते हैं। पर जितने सही हैं सबका क्रियान्वयन नहीं हो सकता। कुछ मत और सपने इंतजार  करते हैं। युगों तक।

गुरुवार, 18 मार्च 2010

सब सही अपनी जगह हैं
सबका अपना न्याय है
चाह के सागर में सबकी
अपनी - अपनी नाव है

एक झोंका
स्वप्न टूटा
तुम न टूटे
तुम न झूठे
तो अमिट हो
कालजित हो

हर नज़र में
सच छुपा है
हर नज़र में
जिंदगी है
देख पायें हम उसे तो
ये हमारी रोशनी है ........
दरियादिली है ..........
टैलेंटेड इडियट्स का कमाल


थ्री इडियट्स हिट रही है . पटकथा को लेकर विवाद भी जारी है . जादूगर कौन है - अभिजात जोशी या चेतन भगत ? इसका फैसला आप ही कीजिए . राजकुमार हिरानी का निर्देशन चुस्त है . यह फिल्म दर्शक को हंसाती है, रोमांचित (खासकर सू -सू करते हुए इलेक्ट्रिक वाला दृश्य ) करती है और एक सन्देश देती है . यह सन्देश हमारी ( अंग्रजों की बनाई) शिक्षा व्यवस्था को लेकर है .फिल्म कहती है कि आज़ाद सोच और मुश्किलों का व्यवहारिक हल खोजना ज्यादा जरूरी है . रटंत ज्ञान चमत्कार और बलात्कार में फर्क नहीं कर पता , लोगों को पठित मूर्ख बना देता है .

इस सन्देश में नया क्या है ? यह वही बात है जिसे शिक्षाविद वर्षों से कह रहे हैं . नया है तो कहने का फ़िल्मी तरीका . छात्रों का आये दिन ख़ुदकुशी करना लोगों और सिस्टम को आक्रोशित चाहे न करे, राजू रस्तोगी (शर्मन जोशी ) का छत से कूदना दिल दहला देता है .
परदे कि दुनिया में फोटोग्राफी में दिलचस्पी रखने वाले फरहान (आर . माधवन ) को मशहूर फोटोग्राफर के साथ काम करने का आफर आता है . असली कि दुनिया में ऐसा कितनी बार होता है ? यही हमारे समाज और समय कि त्रासदी है .

रैंचो (आमिर खान ) नायक है . वह पढ़ता हुआ कभी नहीं दिखता लेकिन परीक्षाओं में हर बार प्रथम रैंक .वह अद्भुत है क्योंकि इसी किरदार में सबसे ज्यादा विरोधाभास उभरते हैं - असल जिंदगी में गौर करने पर . हमारी पीढ़ी का आदर्श है वह . पिया को उसने जो पाठ पढ़ाया वह लड़कियों के लिए बड़े काम की है. रामलिंगम (ओमी वैद्य ) नव - उदारवादी दौर में अजेय है . उसे हराकर फिल्म जमीनी हकीकत को ट्रांसेंड करती है . आमिर खान लद्दाख की वादियों में एक्सपेरिमेंट कर रहे हैं ; नया अविष्कार करने के लिए नहीं , फिल्म को हिट करने के लिए .

कुलमिलाकर , फिल्म बहुत अच्छी है . आपने लुत्फ़ उठाया ! तिरुअनंतपुरम में ९७वीं विज्ञान कांग्रेस हो रही है . उम्मीद है हमारे कर्ता-धर्ता शिक्षा और विज्ञान शिक्षा को लेकर कुछ जरूर करेंगे . और लोग सुदर्शन बाला के लुभावने नृत्य और पाश की कविता में - कविता को चुनेंगे . थोड़ी सी इज्जत काबिल को भी बख्शेंगे . कामयाब की चमक पर संयत रहेंगे .
आज उसी से हम पूछेंगे !


अंगारों पर पांव जला कर,
जिसने चलना सीखा है .
अपना सबकुछ खो कर जिसने,
संयत मुस्काना जाना है .

माँ की अंगुली पकड़ चला वह,
हमने उसको गिरा दिया .
मुंह भर मिट्टी खाकर जिसने,
गिर कर उठना सीखा है .

पड़ी चवन्नी जेब में जिसने ,
अपनी दिवाली बिता दिया .
जब -जब उसने हँसना चाहा,
तब -तब हमने रुला दिया.

हमने बेंत से उसको पीटा,
ताकि वह रटना सीखे .
बचपन उसका मार दिया ,
ताकि वह कुछ बनना सीखे .

जब से उसने होश संभाला,
हमने अपनी दृष्टि भिड़ा दी.
उसके मन की कभी न पूछा,
संदेशों की झड़ी लगा दी .

प्यार भरी हर एक निगाह की ,
हमने कीमत बहुत वसूली .
जब 'सेकेण्ड' आ गया कभी वह ,
अपने 'नमक' की याद दिला दी.

अग्निकुंड में उम्र बिताकर,
बिन रोए आंसू टपका कर,
उसने पराएपन को जीया,
सशर्त प्रेम का घूँट है पीया.


आज उसी से हम पूछेंगे !
क्यों योवन उसका चला गया ?
क्यों बचपन उसका चला गया ?
इतना क्रूर बना वह कैसे ?
क्यों सपने बुनना छोड़ दिया ?
क्यों उसने जीना छोड़ दिया ?

अभेद्य दुर्ग की दीवारों में ,
हमने उसको कैद किया .
कहने को आज़ादी दे दी ,
हमने उसका स्वर छीन लिया.

आज उसी से हम पूछेंगे !
युद्ध राग क्यों छेड़ दिया ?
क्यों गांडीव उठाई उसने ?
जीत - हार का क्या मतलब है ?
मेरा गांव बच सके तो मेरी झोपड़ी जला दो............


भारतीय गणतंत्र की साठवीं सालगिरह की सुबह नई दिल्ली का ऐतिहासिक राजपथ घने कोहरे की चादर से ढका था। 5-10 मीटर के दायरे के बाहर कुछ नहीं दिख रहा था। लोग वायुसेना के जांबाजों के आसमानी करतब नहीं देख पाये। इसके बावजूद गणतंत्र दिवस परेड भव्य थी । लोंगो ने देश की सैन्य शक्ति और समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को महसूस किया।


कार्यक्रम की शुरुआत प्रधानमंत्री,राष्ट्रपति और कोरिया गणराज्य के राष्ट्रपति ली म्युंग के अतिथि मंच पर आगमन से हुई। इसके बाद राष्ट्रपति द्वारा राष्ट्रध्वज फहराया गया। बैंड द्बारा राष्ट्रगान की प्रस्तुति हुई और इक्कीस तोपों की सलामी दी गई।


सात बजे तक ऐसा लग रहा था कि मौसम साफ रहेगा और धूप खिलेगी। लेकिन सात बजे के बाद कोहरा छाने लगा। धुंध के कारण सड़क के उस पार बैठे लोगों को भी देखना मुश्किल हो गया। यहाँ तक कि अतिथि मंच भी नहीं दिखाई दे रहा था।

इसी मौसम में तय कार्यक्रम के मुताबिक दस बजे परेड आरम्भ हुई। परमवीर चक्र और अशोक चक्र विजेताओं के बाद घुड़सवार दस्ता राजपथ से होकर गुजरा। इसके बाद अर्जुन टैंक आया। एक-एक करके मल्टीपल रॉकेट लांच सिस्टम, इंजीनियर टोही वाहन- ‘सर्वत्र’ और संचार वाहन- ‘संयुक्ता’ का प्रदर्शन किया गया। राजपथ के दोनों तरफ लोग ही लोग दीख रहे थे। कड़ी ठंड और कुहासे के बावजूद लोगों की आँखों में उत्साह था,चमक थी। इसके बाद मार्च करती सेना की टुकड़ियाँ सामने से गुजरीं। कठोर अभ्यास से तराशी गई गति,एकता और लय अद्भुत थी।


डीआरडीओ (रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन) की ओर से हल्के लड़ाकू विमान तेजस, अग्नि-3 मिसाइल,शौर्य मिसइल और रोहिणी रेडार का प्रदर्शन किय गया।यह पहला मौका था जब तेजस राजपथ पर दुनिया के सामने आया। 3500 किमी रेंज की

अग्नि-3 मिसाइल को देखकर लोगों ने तालियों की गड़गड़ाहट से राष्ट्र भावना व्यक्त की।

सांस्कृतिक झांकी मनमोहक थी। राज्यों ने संस्कृति के विशिष्ट पहलू पेश किये। राजस्थान की ओर से जयपुर की खगोलीय वेधशाला की झांकी प्रस्तुत की गयी । मणिपुर की झांकी में “हियांग तनबा” दिखाया गया। हियांग तनबा एक परंपरागत नौकादौड़ है। इसका आयोजन राज्य की समृद्धि बढ़ाने के लिए किया जाता है। बिहार की झांकी में भागलपुर के रेशम उद्योग का प्रदर्शन किया गया। कर्नाटक की झांकी में आठवीं सदी में चालुक्य राजाओं द्वारा बनवाये गए पट्टादकल मंदिरों को दिखाया गया। मेघालय ने बांस ड्रिप सिंचाई को चित्रित किया। यह सिंचाई की 200 वर्ष पुरानी पद्धति है। जिसे खासी और जयंतिया पहाड़ियों के आदिवासी किसान सुपारी,पान या कालीमिर्च के फसलों के सिंचाई के लिये प्रयोग में लाते हैं। त्रिपुरा ने अपनी झांकी में महान संगीतकार सचिन देव बर्मन को दिखाया । जम्मू कश्मीर की झाँकी में राज्य के विभिन्न शिल्पों को दिखाया गया। छत्तीसगढ़ की झाँकी में कोटमसर की प्राचीन गुफाओँ के सौन्दर्य का चित्रण किया गया। केरल की झाँकी में वहाँ के एक धार्मिक त्यौहार ‘पदयानी’का चित्रण किया गया। पदयानी मध्य केरल में देवी काली के मंदिरों मे मनाया जाता है। इसमें सभी ग्रामीण जाति,पंथ के भेदभाव के बिना सक्रिय रूप में भाग लेते हैं। उत्तराखण्ड की झांकी में कुंभ मेले को दिखाया गया । समुद्र मंथन और हर की पौड़ी का दृश्य मनमोहक था ।


विभिन्न मंत्रालयों नें भी आकर्षक झांकियां प्रस्तुत कीं । संस्कृति मंत्रालय ने अपनी झांकी में भारत के वाद्य यंत्रो को दिखाया । इस झांकी में आभूषणो से अलंकृत वीणा,घुमावदार वाद्य यंत्र घुमसा , शंख, सुशीरावाद्य ,नाथवाद्य और बोर्तल का प्रदर्शन किया गया ।

रेल मंत्रालय की झांकी में भाप के इंजन को दिखाया गया । जनजातीय कार्य मंत्रालय की झांकी में वन्य अधिकार अधिनियम 2006 के जरिए देश की जनजातीय आबादी के अधिकारों को जनजातीय महिला की जीवंत मूर्ति के माध्यम से चित्रित किया गया । युवा कार्यक्रम तथा खेल मंत्रालय ने 19 वें राष्ठ्रमण्डल के आयोजन पर अपनी झांकी प्रस्तुत की । इसमें राष्ठ्रमंडल खेल 2010 के शुभंकर ‘शेरा’और स्टेडियमों

की झलक दिखायी गई । झांकियों के बाद राष्ट्रीय वीरता पुरुस्कार विजेता बच्चे राजपथ पर आये । लोगों ने हाथ हिलाकर उनका अभिवादन किया ।

सीमा सुरक्षा बल के जवानो नें मोटर साईकिलों पर करतब दिखाये । इन्हे देखकर रोंगटे खड़े हो गये। समारोह स्थल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा ।

अब तक मौसम साफ हो गया था । धूप खिल गयी थी । विमानों द्वारा सलामी हुई और मौसम विज्ञान विभाग की ओर गुब्बारे छोड़े गये ।

पूरे कार्यक्रम के दौरान कमेंन्ट्री अच्छी रही। अंत में कमेंटेटर ने कहा –लिव इंडिया, फील इंडिया , लव इंडिया और कहा कि, “मेरा गाँव बच सके तो मेरी झोपड़ी जला दो”। यही गणतंत्र की भावना है । कुर्बालनियों के बिना कोई देश महान नहीं बनता।

गणतंत्र दिवस इसी भावना की महान याद है ।

मंगलवार, 24 नवंबर 2009


PAINTING
1.Painting was the first medium in which mankind started expressing themselves. Alphabets are paintings.

2.Today art has been made so elite -centric that it has lost the organic link with society. Art must have organic link with society and challenges before it.

3. Thousand years ago ,paintings were inclusive ,means there was space for every single individual.

4.In the prehistoric age paintings were in collective ownership.There was no marketing.the day a painter signed a painting , it became a product and exclusivity and money game came into picture.

5.In a painting , a kind of condensation is done. We can say thousands of words in one painting.

6.There has been two themes in Indian painting- a) religion ; b) women. After the establishment of Mughal dynasty war also came into paintings.When a painter chooses religious and mythical topics,he/she looses creative freedom.

7.In the Modern Indian painting , the work of Raja Ravi Verma(1848-1906) is very significant.Today's Indian painting is oriented around his contribution.

8.The world is 3-D whereas paintings are 2-D. So we can't paint the world we see it.

9.A.N. Tagore and Nand Lal Bosh opposed the colonial painting and adopted nationalist tone.

10. Painting is not all about anatomy,but photography is.

10.In a good piece of art,reality of its age should be reflected.

11.To be modern is to be near to common people. If you are not concerned with public at large , you are not modern.

12.Somnath, Janul Abidin and Chitra Prasad are the great painters of modern India who raised the issues relating to the masses and their sufferings.

13.It is the responsibility of the to register the changes occurring in society and maintain its continuity.

14.Different people can draw different meanings out of a piece of art.It happens to all creative genres.

15.Art and craft of creating a painting and choice of theme-both are equally important.

(Sorry for not presenting a detailed report and also for using English)

THANKS

SHIVANAND