गुरुवार, 18 मार्च 2010

टैलेंटेड इडियट्स का कमाल


थ्री इडियट्स हिट रही है . पटकथा को लेकर विवाद भी जारी है . जादूगर कौन है - अभिजात जोशी या चेतन भगत ? इसका फैसला आप ही कीजिए . राजकुमार हिरानी का निर्देशन चुस्त है . यह फिल्म दर्शक को हंसाती है, रोमांचित (खासकर सू -सू करते हुए इलेक्ट्रिक वाला दृश्य ) करती है और एक सन्देश देती है . यह सन्देश हमारी ( अंग्रजों की बनाई) शिक्षा व्यवस्था को लेकर है .फिल्म कहती है कि आज़ाद सोच और मुश्किलों का व्यवहारिक हल खोजना ज्यादा जरूरी है . रटंत ज्ञान चमत्कार और बलात्कार में फर्क नहीं कर पता , लोगों को पठित मूर्ख बना देता है .

इस सन्देश में नया क्या है ? यह वही बात है जिसे शिक्षाविद वर्षों से कह रहे हैं . नया है तो कहने का फ़िल्मी तरीका . छात्रों का आये दिन ख़ुदकुशी करना लोगों और सिस्टम को आक्रोशित चाहे न करे, राजू रस्तोगी (शर्मन जोशी ) का छत से कूदना दिल दहला देता है .
परदे कि दुनिया में फोटोग्राफी में दिलचस्पी रखने वाले फरहान (आर . माधवन ) को मशहूर फोटोग्राफर के साथ काम करने का आफर आता है . असली कि दुनिया में ऐसा कितनी बार होता है ? यही हमारे समाज और समय कि त्रासदी है .

रैंचो (आमिर खान ) नायक है . वह पढ़ता हुआ कभी नहीं दिखता लेकिन परीक्षाओं में हर बार प्रथम रैंक .वह अद्भुत है क्योंकि इसी किरदार में सबसे ज्यादा विरोधाभास उभरते हैं - असल जिंदगी में गौर करने पर . हमारी पीढ़ी का आदर्श है वह . पिया को उसने जो पाठ पढ़ाया वह लड़कियों के लिए बड़े काम की है. रामलिंगम (ओमी वैद्य ) नव - उदारवादी दौर में अजेय है . उसे हराकर फिल्म जमीनी हकीकत को ट्रांसेंड करती है . आमिर खान लद्दाख की वादियों में एक्सपेरिमेंट कर रहे हैं ; नया अविष्कार करने के लिए नहीं , फिल्म को हिट करने के लिए .

कुलमिलाकर , फिल्म बहुत अच्छी है . आपने लुत्फ़ उठाया ! तिरुअनंतपुरम में ९७वीं विज्ञान कांग्रेस हो रही है . उम्मीद है हमारे कर्ता-धर्ता शिक्षा और विज्ञान शिक्षा को लेकर कुछ जरूर करेंगे . और लोग सुदर्शन बाला के लुभावने नृत्य और पाश की कविता में - कविता को चुनेंगे . थोड़ी सी इज्जत काबिल को भी बख्शेंगे . कामयाब की चमक पर संयत रहेंगे .

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