बुधवार, 19 दिसंबर 2018

अनुकूलता में सुख और प्रतिकूलता में कष्ट प्राणिमात्र का स्वभाव है। प्राणियों में मनुष्य अनुभूति / भावना और विचार की सर्वाधिक ऊंचाई पर माना जाता है। मनुष्य का जीवन जगत में है, हर आदमी किसी न किसी परिस्थिति में जीवन जी रहा और फैसले कर रहा है।यह परिस्थिति - कौन किसका पुत्र/ किस परिवार का है,कितनी संपत्ति का मालिक है,कौन सी भाषा बोलता है , क्या कर सकता है क्या नहीं, किस देश,क्षेत्र का है ,समाज,शिक्षा आदि चीजों से तय होती है। परिस्थिति पर हमारा वश नहीं है। वश केवल अपने पर ,वो भी बहुत सीमित रूप में है। ऐसे में ही कहा गया कि कर्म पर ही अधिकार है।

जो संसारी हैं, सबके मन में  सपने हैं। किसी को कुर्सी चाहिए,किसी को पैसा, किसी को प्रतिष्ठा, और भी बहुत कुछ , असीम अनंत है सपनों की गिनती। यह मानव स्वभाव है,किसी एक का नहीं कि उसे भर अनुशासित कर दिया जाय । ये सपने इच्छाएं हैं- कामनाएं, जरूरतों से उपजी, अनिवार्य और गैर अनिवार्य।

बस यही रहा है मानव इतिहास का अफसाना कि लोगों के सपने अलग अलग होते हैं। किन्हीं दो लोगों ने कभी बिल्कुल एक सा सपना नहीं देखा। यह इसलिए की कोई दो व्यक्ति एक से हैं ही नहीं । छह सात अरब में कोई दो एक से हैं ही नहीं ।जितने आदमी उतने सपने। अगर विचार स्थितियों से बनते हैं,तो जितने आदमी हैं उतनी स्थितियां हैं,उतने ही विचार भी होने ही हैं।

ऐसे में ही सारे धर्म बने । कानून बने । नैतिक मूल्य बने। रीति रिवाज और परंपराएं बनीं। इन सबको गति देने के लिए दफ्तर और इमारतें बनीं।

परिवार केवल जैविक इकाई नहीं,सुरक्षित समूह  में जीने की भावनात्मक - नैतिक - सामाजिक - आर्थिक इकाई भी है। सबसे प्राथमिक समूह है। सबसे मजबूत संस्था है। रामायण और महाभारत की कहानियां परिवारों की कहानियां पहले हैं,राजनीति की बाद में हैं।

जो परिवार से भी अधिक सघन और एकाकार है , वह है व्यक्ति। व्यक्ति एक सम्पूर्ण विश्व है स्वयं में । उसमें वह सब कुछ है जो सारे संसार में कहीं भी है। हर व्यक्ति की भावनाएं हैं , विचार हैं जिनके साथ उस व्यक्ति की क्षमताएं जुड़ी हुई हैं।ये क्षमताएं हैं, लेकिन सीमित हैं। हर शेर के सामने कोई न कोई सवा शेर आना ही है,आज नहीं तो कल। सभी अपनी सीमा से पार जाने में बढ़िया महसूस करते हैं। व्यक्ति बहुत छोटा है,पर संसार भर से लड़ता रहा है। कभी किसी बात के लिए,कभी किसी बात के लिए। हर व्यक्ति के सामने हर क्षण कोई न कोई फैसला है करने को,निर्णय न करना भी उसी का निर्णय माना जाता है। ऐसे में चीज़ें किसी के लिए आसान नहीं ।

मतांतर स्वाभाविक है । बहुत से मतों में कोई एक नहीं, कई सही होते हैं। पर जितने सही हैं सबका क्रियान्वयन नहीं हो सकता। कुछ मत और सपने इंतजार  करते हैं। युगों तक।

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