गुरुवार, 18 मार्च 2010

आज उसी से हम पूछेंगे !


अंगारों पर पांव जला कर,
जिसने चलना सीखा है .
अपना सबकुछ खो कर जिसने,
संयत मुस्काना जाना है .

माँ की अंगुली पकड़ चला वह,
हमने उसको गिरा दिया .
मुंह भर मिट्टी खाकर जिसने,
गिर कर उठना सीखा है .

पड़ी चवन्नी जेब में जिसने ,
अपनी दिवाली बिता दिया .
जब -जब उसने हँसना चाहा,
तब -तब हमने रुला दिया.

हमने बेंत से उसको पीटा,
ताकि वह रटना सीखे .
बचपन उसका मार दिया ,
ताकि वह कुछ बनना सीखे .

जब से उसने होश संभाला,
हमने अपनी दृष्टि भिड़ा दी.
उसके मन की कभी न पूछा,
संदेशों की झड़ी लगा दी .

प्यार भरी हर एक निगाह की ,
हमने कीमत बहुत वसूली .
जब 'सेकेण्ड' आ गया कभी वह ,
अपने 'नमक' की याद दिला दी.

अग्निकुंड में उम्र बिताकर,
बिन रोए आंसू टपका कर,
उसने पराएपन को जीया,
सशर्त प्रेम का घूँट है पीया.


आज उसी से हम पूछेंगे !
क्यों योवन उसका चला गया ?
क्यों बचपन उसका चला गया ?
इतना क्रूर बना वह कैसे ?
क्यों सपने बुनना छोड़ दिया ?
क्यों उसने जीना छोड़ दिया ?

अभेद्य दुर्ग की दीवारों में ,
हमने उसको कैद किया .
कहने को आज़ादी दे दी ,
हमने उसका स्वर छीन लिया.

आज उसी से हम पूछेंगे !
युद्ध राग क्यों छेड़ दिया ?
क्यों गांडीव उठाई उसने ?
जीत - हार का क्या मतलब है ?

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